भव्य इमारत या बेहतर इलाज?
पीएमसीएच के इमरजेंसी वार्ड से उठते असहज सवाल
पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के नवनिर्मित इमरजेंसी वार्ड में अव्यवस्था का आरोप
आज मित्र के बीमार इलाजरत परिजन को देखने के क्रम में एक पत्रकार के रूप में पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के नवनिर्मित आलीशान इमरजेंसी वार्ड का दौरा करने का अवसर प्राप्त हुआ।
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने के दावों के बीच पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के नवनिर्मित इमरजेंसी वार्ड का उद्घाटन राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बड़े उत्साह के साथ किया गया।
इसे आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ कंक्रीट, कांच और चमकती दीवारें ही स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूती का प्रमाण हैं?
भव्य भवन, लेकिन सवाल व्यवस्था पर ?
पहली नजर में इमरजेंसी वार्ड का ढांचा आधुनिक और आकर्षक दिखाई देता है। साफ-सफाई और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम दिखे।
हालांकि, अस्पताल परिसर में सरकारी डॉक्टरों और नर्सों की तुलना में निजी सुरक्षा गार्डों की संख्या अधिक प्रतीत हुई,
जिससे कुछ सवाल खड़े होते हैं।
सुरक्षा ज्यादा, संवेदनशीलता कम?
क्या अस्पताल अब सेवा केंद्र से अधिक “नियंत्रण केंद्र” बनते जा रहे हैं?
जब एक मरीज के परिजनों ने समय पर इलाज न मिलने का आरोप लगाया और आक्रोश व्यक्त किया, तो जवाब संवाद से नहीं, बल्कि कथित रूप से लाठी से दिया गया।
यदि शोकाकुल परिजन अपनी पीड़ा प्रकट करें और उन्हें बल प्रयोग से चुप कराया जाए, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की हार है।
इलाज में देरी का आरोप और परिजनों का आक्रोश
दौरे के दौरान एक दुखद घटना देखने को मिली।
एक मरीज के परिजनों का आरोप था कि समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण उनके परिजन की मृत्यु हो गई।
शोक और आक्रोश में परिजनों ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई।
स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई जब मौके पर मौजूद निजी सुरक्षा गार्डों और परिजनों के बीच तीखी नोकझोंक हुई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुरक्षा कर्मियों ने लाठी का प्रयोग किया।
सुरक्षा कर्मियों का पक्ष
मीडिया के हस्तक्षेप के बाद सुरक्षा इंचार्ज ने कहा कि अस्पताल में व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्हें सख्ती बरतनी पड़ती है।
वरिष्ठ अधिकारियों की प्रतिक्रिया
घटना की सूचना मिलते ही अस्पताल के वरिष्ठ पदाधिकारी मौके पर पहुंचे। उनके पहुंचते ही वार्ड में कार्यप्रणाली व्यवस्थित होती नजर आई।
“मारना जरूरी है” —
क्या यही है व्यवस्था?
सबसे चिंताजनक बात वह कथित बयान है जिसमें कहा गया कि “बिहार के लोगों को समझने के लिए मारना जरूरी है।”
मीडिया द्वारा जब सुरक्षा गार्डों के व्यवहार पर सवाल उठाया गया
मीडिया प्रतिनिधि ने कहा कि यहां के प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड मरीज के परिजन को डंडे से मारते हैं तो एक वरिष्ठ अधिकारी का साफ जवाब था “बिहार के लोगों को समझाने के लिए मारना जरूरी है”
यदि लोकतंत्र की यह दास्तान बिहार राज्य के गरीब लोगों पर नियामनकुल निकलती है तो ऐसी लोकतंत्र को दिल से सलाम तो करना ही पड़ेगा
यदि यह सोच व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है, तो यह लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक संकेत है। अस्पताल वह स्थान है जहां पीड़ा का इलाज होता है, न कि आवाज का दमन।
लोकतंत्र और व्यवस्था पर सवाल
यह घटना कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती है —
क्या आधुनिक भवन ही बेहतर स्वास्थ्य सेवा की गारंटी है?
क्या सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य मरीजों और परिजनों की सहायता है या नियंत्रण?
क्या शोकाकुल परिजनों के साथ संवाद और संवेदनशीलता की आवश्यकता नहीं है?
बिहार जैसे राज्य में, जहां बड़ी आबादी सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है, वहां इस प्रकार की घटनाएं स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था का सुधार भवन निर्माण से नहीं, बल्कि इन बिंदुओं से मापा जाना चाहिए:
• समय पर और गुणवत्तापूर्ण इलाज
• पर्याप्त डॉक्टर और नर्सों की उपलब्धता
• पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन
• मरीजों और परिजनों के साथ मानवीय व्यवहार
यदि आधुनिक इमारत के भीतर पुरानी संवेदनहीनता ही कायम रहे, तो यह सुधार नहीं, बल्कि सिर्फ बाहरी सजावट है।
लोकतंत्र की कसौटी
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि नागरिकों के सम्मान और अधिकारों से जीवित रहता है। गरीब और असहाय नागरिक जब सरकारी अस्पताल का दरवाजा खटखटाता है, तो वह सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि भरोसा भी मांगता है।
असली सुधार क्या है?
यदि उसी भरोसे का जवाब कठोरता और दमन से दिया जाए, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रश्नचिह्न है।
अंत में
पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल की नई इमारत निस्संदेह आधुनिक है। लेकिन असली परीक्षा इस बात की है कि क्या यह भवन मरीजों के लिए सम्मान, संवेदना और समय पर इलाज की गारंटी भी देगा?
सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा “सुविधा” नहीं, बल्कि “अधिकार” है — और अधिकार की रक्षा डंडे से नहीं, व्यवस्था और संवेदनशीलता से होती है।
